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जब ज़िन्दा था

जब ज़िन्दा था तो काश तुम सीख लेती जीने का क़ायदा


शम-ए-तुर्बत की रौशनी में ग़मज़दा होने का क्या फ़ायदा


इख़्लास-ओ-मोहब्बत जुरूरी है मुख़्तसर सी ज़िंदगी में


अपना बनाने को शर्त-ए-मुरव्वत रखने का क्या फ़ायदा


सर-ए-दीवार रोती रह ज़ालिम मैं लौट के नहीं आने वाला


क़ब्रनशीं के साथ ख़्वाब-ए-क़ुर्बत सजाने का क्या फ़ायदा


तह-ए-क़ब्र तो सुकून-बख़्श मुझे तिरी मौजूदगी खलती है


मक़्तूल-ए-शौक़ हूँ अब मोहब्बत जताने का क्या फ़ायदा


पास-ओ-लिहाज़ में बिता दी सारी उम्र फ़ना होने से पहले


ज़मींदोज हूँ 'राहत' ब-सद-इनायत१० दिखाने का क्या फ़ायदा


 

                                              -  डॉ. रूपेश जैन 'राहत'



शब्दार्थ:


१ शम-ए-तुर्बत -: क़ब्र पर दीपक


२ इख़्लास-ओ-मोहब्बत -: लगाव और प्रेम


३ मुख़्तसर -: थोड़ा, अल्प


४ शर्त-ए-मुरव्वत -: प्रेम की शर्त


५ सर-ए-दीवार -: दीवार के नीचे


६ ख़्वाब-ए-क़ुर्बत - निकटता के सपने


७ तह-ए-क़ब्र -: समाधी के नीचे


८ मक़्तूल-ए-शौक़ -: प्रेम में मारा गया


९ पास-ओ-लिहाज़ -: सम्मान और ध्यान


१० ब-सद-इनायत -: सैकड़ों तरह की अच्छाई/दयालुता