खुले आसमाँ की धूप भी पिया कर
आलीशान महलों में वो गर्माहट नहीं
कभी खुले आसमाँ की धूप भी पिया कर
कोई फर्क ही नहीं है राम और अल्लाह में
दिल जिसे मानता है,नाम उसी का लिया कर
महँगाई बेइन्तहां है तो रास्ते भी बखूब हैं
किसी की मदभरी आँखों से पीके जिया कर
वक़्त अपनी चाल से ही चलेगी समझा कर
दुनियादारी छोड़,दो घड़ी आराम किया कर
बच्चियाँ पालने का ये नया दौर है मियाँ
आँखों में बग़ावत,हाथों में हथियार दिया कर
- सलिल सरोज