Top Story

खुले आसमाँ की धूप भी पिया कर

आलीशान महलों में वो गर्माहट नहीं

कभी खुले आसमाँ की धूप भी पिया कर


कोई फर्क ही नहीं है राम और अल्लाह में

दिल जिसे मानता है,नाम उसी का लिया कर


महँगाई बेइन्तहां है तो रास्ते भी बखूब हैं

किसी की मदभरी आँखों से पीके जिया कर


वक़्त अपनी चाल से ही चलेगी समझा कर

दुनियादारी छोड़,दो घड़ी आराम किया कर


बच्चियाँ पालने का ये नया दौर है मियाँ

आँखों में बग़ावत,हाथों में हथियार दिया कर


- सलिल सरोज