मुझको तेरा अंदाज़ समझ में आता है
मुझको तेरा अंदाज़ समझ में आता है
मिन्नतें, दुश्वारियां, हर राज़ समझ में आता है
जिसकी दुहाई देते हो उसी को नोचते हो
मुझे तुम्हारा दोगला समाज समझ में आता है
नफरत भारी है इस कदर मोहब्बत पर कि
मुझे ज़माने का कल और आज समझ में आता है
ज़ुल्म करने वाले बहुत सफेदपोश होते है
मुझे मासूम चेहरे में छिपा बाज़ समझ में आता है
दे दिया होता जो अधिकार तो तुम औकात पे आते, सो
मुझे बेटियों के रौंदने का रिवाज समझ में आता है
इतना ज़ुल्म करके खुदा से नज़रें कैसे मिलाओगे
मुझे न दलील न कोई आवाज़ समझ में आता है
- सलिल सरोज