आपको देखके न जाने क्या क्या सोचते होंगे
आपको देखके न जाने क्या क्या सोचते होंगे
ज़मीं पे सरगोशी करता कोई चाँद सोचते होंगे
क्या कोई आतिश थी या कोई नर्म फुहार
फ़िज़ा से आपके जाने के बाद सौ मर्तबा सोचते होंगे
आपकी निगाहों से उजाले की कोई नहर बहती है
वीरान शहर में आपको गली आबाद सोचते होंगे
आपकी परछाई की ये कशिश भी तो देखिए
जिस पे भी पड़ी,खुद को शमशाद सोचते होंगे
आप जिस जिस से भी मिली ज़माने में
मरहबा सब खुद को बेइन्तहां शाद सोचते होंगे
- सलिल सरोज