पॉलिटॉकः फोन बंद करना हिमंत बिस्व सरमा के काम आया?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसके बाद उनका फोन करीब तीन घंटे बंद रहा। इससे बीजेपी में हड़कंप मच गया। इसके बाद बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को लगा कि मुख्यमंत्री का नाम तय करने में और देरी ठीक नहीं। फिर हिमंत को संदेश भेजा गया कि दिल्ली में मीटिंग के लिए तैयार रहिए। आप सीएम बनाए जा रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले भी हिमंत बीजेपी लीडरशिप को ऐसा ही झटका दे चुके थे।

राजनीति में कई ऐसी बातें हो जाती हैं, जिनका कोई रेकॉर्ड नहीं होता। ‘माउथ पब्लिसिटी’ से ये एक से दूसरे तक पहुंचती हैं, लेकिन इसके बावजूद इन्हें प्रामाणिक माना जाता है। अब जैसे, हिमंत बिस्व सरमा को ही लीजिए। कहा जा रहा है कि उन्होंने तीन घंटे तक फोन बंद रखा और उनके असम का मुख्यमंत्री चुने जाने की यह एक बड़ी वजह है। सरमा इसके लिए अड़े हुए थे। असल में बीजेपी की टॉप लीडरशिप फैसला नहीं ले पा रही थी कि मुख्यमंत्री बनाया जाए तो किसे? हिमंत को लगा कि अगर मामला लटकता गया तो मुख्यमंत्री बनने की उनकी उम्मीद टूट सकती है। इसलिए उन्होंने बीजेपी के एक बड़े नेता को फोन मिलाया और कहा, ‘मुझे इंतजार करना कभी पसंद नहीं रहा। बीजेपी में मेरे समर्थन में पचास विधायक हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाला महागठबंधन भी उन्हें समर्थन देने को तैयार बैठा है। बस मेरे हां करने भर की देरी है। अब आप लोग अपना फैसला बताएं ताकि मैं अपना फैसला ले सकूं।’ राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसके बाद उनका फोन करीब तीन घंटे बंद रहा। इससे बीजेपी में हड़कंप मच गया। इसके बाद बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को लगा कि मुख्यमंत्री का नाम तय करने में और देरी ठीक नहीं। फिर हिमंत को संदेश भेजा गया कि दिल्ली में मीटिंग के लिए तैयार रहिए। आप सीएम बनाए जा रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले भी हिमंत बीजेपी लीडरशिप को ऐसा ही झटका दे चुके थे। तब सर्बानंद सोनोवाल सीएम थे। स्वाभाविक तौर पर पार्टी मौजूदा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही चुनावी मैदान में उतरती है। अगर असम में ऐसा होता तो हिमंत के इस कुर्सी पर बैठने की उम्मीद खत्म हो जाती। सो, उन्होंने चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया। सच यह भी था कि अगर वह खुद को अलग कर लेते तो असम में बीजेपी के लिए कुछ नहीं बचता। पार्टी तब भी दबाव में आ गई थी। उसे यह फैसला लेना पड़ा कि चुनाव से पहले किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जाएगा। यहां तक कि तत्कालीन सीएम सोनोवाल को भी नहीं।
बीजेपी मुख्यमंत्रियों की चिंता

असम के जरिए बीजेपी की टॉप लीडरशिप ने दो संदेश दिए हैं। पहला, जरूरी नहीं कि जो मौजूदा सीएम है, उसी के नेतृत्व में अगला चुनाव भी लड़ा जाए। दूसरा, सीएम बनने के लिए मूल काडर की अनिवार्यता खत्म। कहीं से भी आए हो, कब आए हो, इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस आपमें सरकार बनाने और बिगाड़ने की हैसियत होनी चाहिए। कहते हैं कि इससे बीजेपी शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की चिंता बढ़ गई है। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर कांग्रेस यह तंज करती आई है कि उनके यहां रहते तो मुख्यमंत्री बन भी सकते थे, लेकिन बीजेपी तो अपने काडर को ही सीएम बनाएगी। असम का घटनाक्रम सामने आने के बाद कहा जाने लगा है कि बीजेपी में रहते हुए सिंधिया के सीएम बनने का दावा मजबूत हुआ है। यूपी में योगी आदित्यनाथ की भी चिंता बढ़नी स्वाभाविक है। राज्य का चुनाव करीब आ रहा है। इसी बीच, सोशल मीडिया पर यह सवाल उछल गया है कि क्या केशव प्रसाद मौर्य भी हिम्मत दिखाएंगे? 2017 में मौर्य के हाथ सीएम की कुर्सी आते-आते रह गई थी। पार्टी ने अति पिछड़ी जाति से आने वाले अपने इस नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर चुनाव लड़ा था, लेकिन सरकार बनी तो उन्हें डिप्टी सीएम पद से ही संतोष करना पड़ा। इस बात की टीस खत्म नहीं हुई है। असम के मामले से राजस्थान बीजेपी के भी कई नेता फिक्रमंद हैं। उन्हें लग रहा था कि वसुंधरा राजे को किनारे लगाने में कामयाब होने पर सीएम पद के लिए उनकी दावेदारी मजबूत होगी।
अब ‘ना’ ही समझिए!

कोविड की दूसरी लहर में बढ़े खतरे के बाद अगर किसी की कोई चर्चा है तो वह हैं नितिन गडकरी। सोशल मीडिया के जरिए इस मांग ने जोर पकड़ लिया है कि मौजूदा हालात से निपटने के लिए गडकरी योग्य नेता हैं। इसलिए हर्षवर्धन को हटाकर गडकरी को ही स्वास्थ्य मंत्री बनाया जाए। इस मांग के समर्थन में बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी हैं। उन्होंने ट्वीट किया, ‘भारत कोरोना वायरस महामारी से भी उसी तरह उबर जाएगा, जैसे वह मुस्लिम आक्रमणकारियों और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से उबरा था। अभी कड़े एहतियात नहीं बरते गए, तो हो सकता है कि हम कोरोना की एक और लहर का सामना करें, जिससे बच्चे भी प्रभावित होंगे। इसलिए मोदी को चाहिए कि वह इस जंग की अगुआई गडकरी के हाथों में दे दें। प्रधानमंत्री कार्यालय के भरोसे रहना बेकार है।’ उनके इस ट्वीट पर किसी ने सवाल किया कि गडकरी ही क्यों? इस पर स्वामी ने कहा, ‘क्योंकि कोविड-19 का सामना करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार की जरूरत है। गडकरी इस क्षेत्र में अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं।’ उधर, महाराष्ट्र के इस दिग्गज नेता को समझ नहीं आ रहा है कि यह सारा अभियान उनके पक्ष में है या उनके खिलाफ जा रहा है? मीडिया के कुछ लोगों ने तो गडकरी के ऑफिस फोन लगा दिया। उन लोगों ने पूछा कि गडकरी को स्वास्थ्य मंत्री बनाए जाने को लेकर जो अटकलें लग रही हैं, उनमें कितना दम है? इस पर एक अधिकारी ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया, ‘स्वामी जी के समर्थन में आने के बाद तो जो दम रहा होगा, वह भी निकल गया होगा। इसकी संभावना ‘ना’ के बराबर ही समझिए।’ वैसे राजनीतिक गलियारों में यह तय माना जा रहा है कि स्थितियां काबू में आते ही स्वास्थ्य मंत्रालय में फेरबदल जरूर होगा, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री कौन होगा, इसका जवाब उसी वक्त मिलेगा।
क्या वापस आएंगे ‘बागी’

जब आप बड़ी कामयाबी के साथ सत्ता में लौटते हैं तो आपके पास प्रयोग के कई मौके भी होते हैं। टीएमसी के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। अब जैसे पार्टी में इस पर मंथन शुरू हुआ है कि बीजेपी को झटका दिया जाए या ‘बागियों’ की ‘बरबादी’ पर जश्न मनाया जाए? कहा जा रहा है कि चुनाव से पहले टीएमसी से बीजेपी में जाने वाले कई प्रभावशाली नेता वापसी करना चाहते हैं। असल में इन लोगों को बीजेपी में अपना कोई भविष्य नहीं दिख रहा। और तो और बीजेपी के कुछ सांसदों और विधायकों के भी टीएमसी के संपर्क में होने की बात कही जा रही है। पार्टी के कुछ नेता चाहते हैं कि बीजेपी का मनोबल तोड़ने के लिए काम के कुछ नेताओं को अपने पाले में कर लेना चाहिए। इससे बंगाल में मजबूत होने का बीजेपी का एजेंडा कमजोर होगा। टीएमसी में कुछ नेताओं का कहना है कि लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल से ज्यादा वक्त बाकी है। ऐसे में बीजेपी में जो लोग गए हैं, उन्हें अभी वापस लेना ठीक नहीं होगा। वैसे, इस पूरे मामले में देखने वाली बात होगी कि ‘दीदी’ का अंतिम फैसला क्या होता है?
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