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'बंगाल में विकल्प बहुत कम थे, कांग्रेस सीटें जीतने पर अड़ी रहती तो देश हार जाता'

पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के बेहद कमजोर प्रदर्शन के बाद भी पार्टी की टॉप लीडरशिप इस वजह से खुश है कि बीजेपी बंगाल नहीं जीत सकी। इस नजरिये पर पार्टी के अंदर भी सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली में पार्टी की एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने ट्वीट कर कहा, 'यदि हम (कांग्रेसी) मोदी की हार में ही अपनी खुशी ढूंढते रहेंगे, तो अपनी हार पर आत्म-मंथन कैसे करेंगे?' बिहार से भी पार्टी के एक राज्य प्रवक्ता का बयान आया है, 'दूसरे के घर में बच्चा पैदा होने की बहुत ख़ुशी मना लिये, अब खुद भी कोशिश करनी चाहिए जिससे अपना घर भी खिलखिलाए।' एनबीटी के नैशनल पॉलिटिकल एडिटर नदीम ने कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव तारिक अनवर से बात कर जानने की कोशिश की कि पार्टी अपनी हार में भी जीत कैसे देख रही है। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश: पांच राज्यों के चुनाव में इतनी बुरी हार... आप लोगों को पहले से अंदाजा था या दो मई के नतीजे अप्रत्याशित थे? हार-जीत, उतार-चढ़ाव राजनीति का हिस्सा है। ऐसा सिर्फ कांग्रेस के साथ नहीं हो रहा है, अतीत में जाएं तो तमाम दूसरी पार्टियों को भी ऐसे दौर से गुजरना पड़ा है। दुनिया के दूसरे लोकतांत्रिक देशों में भी ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। सबसे अहम यह होता है कि मुश्किल दिनों में भी आप अपनी विचारधारा के साथ कितनी मजबूती से खड़े हैं। लेकिन कांग्रेस के साथ मुश्किल यह है कि वह लगातार हार से भी सबक लेने को तैयार नहीं है? कैसे लग रहा है कि हम सबक नहीं ले रहे हैं? हाल-फिलहाल में हम दो चुनाव हारे हैं 2014 और 2019 का। अटल जी बीजेपी में मोदी से बड़े नेता माने जाते रहे हैं। कांग्रेस ने उनके नेतृत्व वाली सरकार को परास्त करते हुए लगातार दो चुनाव 2004 और 2009 जीते थे। लगातार दो चुनाव हार जाने से क्या बीजेपी खत्म हो गई थी? बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था। उसे सत्ता में आने का मौका 1996 में मिला था, उस हिसाब से बीजेपी को राजनीति ही खत्म कर देनी चाहिए थी। रही बात विधानसभा चुनाव की तो 2014 से लेकर 2021 के बीच अगर हमने कुछ राज्यों में हार दर्ज की तो कुछ राज्यों में जीते भी हैं। जब आप सत्ता से बाहर होते हैं, तो पार्टी के अंदर कुछ लोग होते हैं जो पार्टी लाइन से हटकर बोल रहे होते हैं। ऐसा 2004 से 2014 के बीच बीजेपी में भी हो रहा था। ताज्जुब इस बात का है कि बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य में आपको एक भी सीट नहीं मिली लेकिन कांग्रेस ने बीजेपी की हार में अपनी खुशी तलाश ली? बंगाल का चुनाव महज सीट हासिल करने का चुनाव नहीं था। वहां इस बात का फैसला होना था कि देश का आगे का सफर किस विचारधारा के साथ होगा। बीजेपी ने बंगाल को प्रयोगशाला बनाया था, अगर वह कामयाब हो जाती तो दूसरे राज्यों में भी वही प्रयोग दोहराती। उसके बाद देश का जो राजनीतिक मिजाज होता, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। बंगाल के नतीजों को लेकर अगर कांग्रेस खुश है तो मोदी की हार की वजह से नहीं बल्कि देश के बचने की वजह से खुश है। आपकी पार्टी की ही एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने ट्वीट कर कहा है, यदि हम (कांग्रेसी) मोदी की हार में ही अपनी खुशी ढूंढते रहेंगे, तो अपनी हार पर आत्म-मंथन कैसे करेंगे? यह उनका व्यक्तिगत नजरिया हो सकता है। हमने हर चुनाव के बाद आत्ममंथन किया है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों पर भी होगा। राजनीति में कई बार ऐसी स्थितियां आती हैं जब आपको सही मौके के लिए थोड़ा लंबा इंतजार करना पड़ जाता है। वैसे बंगाल में जिस तरह से आप लोगों ने मैदान छोड़ा, क्या वह सही रणनीति थी? हमारे सामने विकल्प बहुत सीमित थे। या तो हम देश बचाते या पार्टी। बीजेपी ने धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में पूरी ताकत लगा रखी थी। हम सीटें जीत सकते थे लेकिन उस स्थिति में बीजेपी के मंसूबे पूरे हो जाते। वह तो चाह ही रही थी। गैर बीजेपी वोटों का जितना ज्यादा से ज्यादा से बंटवारा होता, उसके पक्ष में जाता। हमने उसकी चाल को विफल कर दिया। लेकिन बंगाल में बीजेपी के खिलाफ जो विकल्प ममता बनीं, वह कांग्रेस क्यों नहीं बन पाई? इसका फौरी जवाब नहीं दिया जा सकता। बहुत सारी वजहें होंगी इसकी। जब विस्तार से मंथन होगा तब वे सामने आएंगी। हमारे लिए फौरी तौर पर ज्यादा जरूरी यह था कि बीजेपी बंगाल जीतने न पाए और वह हमने नहीं जीतने दिया। बंगाल में फुरफरा शरीफ के पीरजादा की पार्टी और असम में मौलाना अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन क्या कांग्रेस को भारी पड़ गया? जब हम कोई गठबंधन करते हैं तो उस वक्त उससे होने वाले नुकसान का अंदाजा नहीं होता। अगर पहले से पता हो तो गठबंधन हो क्यों? हम क्षेत्रीय नेताओं के साथ जब बैठक करेंगे तो उसमें जरूर यह बात सामने आएगी कि यह गठबंधन क्यों जनभावनाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरा? हमसे जनभावनाओं को समझने में कहां चूक हुई? केरल का हार जाना क्या आप को चौंकाता नहीं? चौंकाता है। केरल वह राज्य है, जहां हम अपनी जीत को लेकर सबसे ज्यादा आशान्वित थे लेकिन वह नहीं कर पाए, जिसकी उम्मीद थी। वहां पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी ने भी नुकसान पहुंचाया है।


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