Explainer: कोवैक्सीन का फॉर्म्युला काफी नहीं, इसे बनाना है असली चैलेंज

टीएनएन, हैदराबाद बीते दिनों जब सरकार ने यह ऐलान किया कि कोवैक्सिन बनाने वाली भारत बायोटेक वैक्सीन का अपना फॉर्म्युला दूसरी कंपनियों से शेयर करने को राजी है तो सभी को उम्मीद जगी कि इससे जरूर कोवैक्सिन की कमी दूर हो जाएगी। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि देश में बहुत कम कंपनियां ही इस लायक हैं कि वे असक्रिय वायरस से वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया को संभाल सकें। बायोकॉन की फाउंडर चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ ने तो यहां तक ट्वीट कर दिया कि मुझे बेसब्री से इंतजार रहेगा कि वैक्सीन बनाने के लिए कौन-कौन आगे आता है। एक बड़ी वैक्सीन कंपनी के टॉप अफसर कहते हैं, असल में कोई भी जिंदा वायरस पर या उसके साथ काम नहीं करना चाहता। बाकी दुनिया में भी कोई इतना खतरा मोल नहीं ले सकता। यही वजह है कि ज्यादातर टीका निर्माता कोरोना के लिए प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन बना रहे हैं। हालांकि महामारी के दौर में जल्दी टीके बनाने के लिए जरूरी है कि जिंदा वायरस को इन ऐक्टिवेट करके वैक्सीन बनाई जाए। इस तरह तेजी से टीके बन सकते हैं। वैक्सीन के जानकार और शांता बायोटेक के फाउंडर केएल वरप्रसाद रेड्डी कहते हैं, वैक्सीन बनाने का कोई फॉर्म्युला नहीं होता। इसे बनाने की प्रक्रिया और तकनीक बड़ा मसला हैं। वैक्सीन कैसे बनती है, यह दूसरों को बता भी दिया जाए तो किसी भी कंपनी को टीके बनाने का काम शुरू करने में 6 से 8 महीने का वक्त लग सकता है। टीके बनाने के लिए बायो सेफ्टी लेवल-3 वाली जगह तैयार करने और उसे मंजूरी मिलने में ही 3 से 6 महीने लग जाएंगे। वहीं लोगों को लाइव वायरस के साथ काम करने के लिए ट्रेनिंग देने में ही कम से कम छह महीने लग जाएंगे। यह मजाक थोड़े ही न है। 'जिंदा वायरस संभालना हर किसी के बस का नहीं' सूत्रों के मुताबिक, कोवैक्सिन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री तैयार करने का काम जिस इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड को सौंपा गया है, उसे भी नए काम के लिए अपनी मौजूदा सुविधाओं को अपग्रेड करने में कम से कम तीन महीने लग जाएंगे। ऐसे में उसके अक्टूबर के बाद ही काम शुरू कर पाने की उम्मीद है। सरकार ने हैफकिन इंस्टीट्यूट और भारत इम्यूनोलॉजिकल्स ऐंड बायोलॉजिकल्स को भी कोवैक्सिन बनाने के लिए कहा है। हालांकि इन्हें भी बीएसएल-3 लेवल की सुविधाएं तैयार करने में कुछ महीने लग जाएंगे। बीएसएल-3 सुविधा के बारे में और विस्तार से बताया डॉ. राकेश के मिश्रा ने। वह सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के पूर्व डायरेक्टर और मौजूदा सलाहकार हैं। उन्होंने बताया कि कोवैक्सिन बनाने के लिए जरूरी है कि कोविड के जिंदा वायरस को पैदा किया जाए। उसे बनाने यानी कल्चर के लिए बड़ा सेटअप चाहिए। इसके लिए बीएसएल-3 कैटिगरी का इंतजाम जरूरी हो जाता है। तकनीक के साथ ट्रेंड लोग भी चाहिए सीसीएमबी के पूर्व डायरेक्टर और नामी वैज्ञानिक डॉ. सीएच मोहन राव कहते हैं, बीएसएल-3 फैसिलिटी के अलावा कोवैक्सिन बनाने की प्रक्रिया में अहम काम जिंदा वायरस को इनऐक्टिव करने का है ताकि वह शरीर में जाकर अपनी वृद्धि न कर सके। टीका बनाने वाली कंपनी को कोवैक्सिन में इस्तेमाल और शरीर में ऐंटीबॉडी तैयार करने वाले पदार्थ को भी बनाना होगा। ऐसे में सिर्फ प्लांट नहीं चाहिए बल्कि पूरी तकनीक, प्रक्रिया और कुशल हाथ भी चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा कि इसे कोई नहीं कर सकता मगर इसके लिए बहुत उच्च स्तर की सेफ्टी और ट्रेंड लोग चाहिए। 'कोविशील्ड, एमआरएनए वैक्सीन बनाना आसान' एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में कोविशील्ड या फाइजर-मॉडर्ना जैसी कोई भी एमआरएनए वैक्सीन बनाना कहीं ज्यादा आसान है क्योंकि इनके लिए बीएसएल-3 प्लांट नहीं चाहिए। मिश्रा कहते हैं, एमआरएनए वैक्सीन बनाने में आसान हैं और तेजी से बनाई जा सकती हैं। इनके लिए बड़ी तादाद में खतरनाक वायरस पैदा करने की जरूरत नहीं। वायरस में पहले ही तब्दीली की जा चुकी है और एक बार इसका डुप्लिकेट तैयार हो जाए तो इसकी कॉपी तैयार करना आसान हो जाता है। बस परेशानी यही है कि अभी ये भारत में मौजूद नहीं। अगर इन वैक्सीन को बनाने वाले इन्हें दूसरी कंपनियों को भी बनाने की इजाजत दे दें तो भारत में इसके लिए सुविधाएं तेजी से जुटाई जा सकती हैं।
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