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दास्तानः जब चंद्रशेखर ने कहा, अपनी पिस्टल मत बेचना

1985 में जनता पार्टी को कर्नाटक विधानसभा में बड़ी जीत मिली थी। रामकृष्ण हेगड़े राज्य के मुख्यमंत्री बने। चंद महीने पहले लोकसभा चुनाव में मिली बुरी हार के बाद यह हम लोगों के गिरे हौसले को संभालने वाली जीत थी। इस जीत के बाद हेगड़े अचानक राष्ट्रीय हस्ती बन गए। कुछ दिनों बाद जनता पार्टी ने तमिलनाडु में चिंतन शिविर आयोजित किया। यह आयोजन भारत यात्रा केंद्र में हो रहा था जिसे चंद्रशेखर ने बनाया था। तीन दिनों के इस शिविर में जनता पार्टी के तमाम बड़े नेता शामिल हुए थे। व्यक्तिगत तौर पर यह शिविर मेरी राजनीतिक जिंदगी का सबसे अहम पड़ाव बना जहां मैंने पार्टी के कई शीर्ष नेताओं के साथ नजदीक से संवाद किया। 

दिल्ली आने के बाद मैं जंतर-मंतर स्थित पार्टी कार्यालय जाने लगा। वहां मैं बापू कालदाते के संरक्षण में प्रेसनोट बनाता था। मेरे बनाए प्रेसनोट जब अखबारों में छपते तो बहुत खुशी मिलती थी। इधर राजनीति में मेरी बढ़ती रुचि और संगठन में सक्रियता बढ़ने से परिवार को वक्त कम देने लगा था। दिल्ली में मेरे पास रहने का कोई स्थायी और व्यवस्थित ठिकाना नहीं था। उन संघर्ष के दिनों में मेरे ससुराल वालों ने मेरा बहुत साथ दिया। मेरा बेटा जयंत अपने नाना-नानी के बेहद करीब था।। जयंत ने मेरी यह मुश्किल देखी तो उसने उनसे अनुरोध किया कि वे अपने वसंत विहार स्थित घर में हमें दो कमरा बनाने दें ताकि हम सब तात्कालिक रूप से रह सकें। 

मेरे ससुर ने इस अनुरोध पर अपनी रजामंदी दे दी। मैंने उनके घर के दूसरे फ्लोर पर दो कमरा और किचन बनाने की योजना बनाई। जब इसके लिए पैसे की कमी हुई तब मैंने जर्मनी में खरीदी अपनी स्काट पिस्टल बेचने की सोची। मेरे मित्र दयानंद सहाय ने उस पिस्टल को खरीदने के लिए 20 हजार का ऑॅफर दिया। तबतक चंद्रशेखर जी को यह बात पता चल चुकी थी कि मैं पैसे की कमी के कारण अपनी पिस्टल बेच रहा हूं। मुझसे इस बारे में बात करने के लिए वह तब हमारे सत्यमार्ग स्थित अस्थायी घर पर आए। जब वह आए उस वक्त घर पर न मैं था और न मेरी पत्नी मौजूद थी। उन्होंने मेरे दामाद के पास मेरे नाम से एक लिफाफा छोड़ दिया। जब मैं आया तो लिफाफा मिला। उसे खोला तो उसमें 20 हजार रुपये थे और एक नोट था जिसमें लिखा था- पिस्टल मत बेचना।

संघ के लिए बना खलनायक

इसके बाद मेरे लिए असमंजस की स्थिति हो गई। चूंकि मैंने दयानंद को वचन दे दिया था, मैंने चंद्रशेखर को अपनी मजबूरी के बारे में बताया। बहुत समझाने के बाद वह समझे। खैर, पैसे की कमी दूर हो गई थी और अंतत: दिल्ली में मेरा अपना ठिकाना बना। मैं सत्य मार्ग से निकल अपने घर में आया जो नीलिमा के पिता की मदद के बिना संभव नहीं था। मैं कभी आरएसएस का सदस्य नहीं रहा। न कभी शाखा गया और न कभी उत्सुकतावश इनके वस्त्र धारण किए लेकिन मेरे लिए संघ के बिना बीजेपी में रहना इसलिए भी आसान रहा क्योंकि मैं पार्टी की आर्थिक और विदेश नीतियों से जुड़ा रहता था। मुझे अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी तभी संघ पदाधिकारियों से मीटिंग के लिए बुलाते जब आर्थिक नीतियों पर विचार करना होता था। 

मैं बीजेपी में आने से पहले ही स्वदेशी विचार से प्रभावित था। ऐसे में बीजेपी में आने के बाद संघ के उस अजेंडे से मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। हालांकि बाद में स्वदेशी जागरण मंच से जरूर कुछ मुद्दों पर मतभेद हुए। जब डब्ल्यूटीओ में डंकल प्रस्ताव रखा गया था तब मैं भी उसका विरोध कर रहा था। मैंने अपने संसदीय क्षेत्र हजारीबाग में इसके खिलाफ 200 लोगों के साथ पटना तक की साइकिल यात्रा भी निकाली थी। मैं अब भी मानता हूं कि खेती देश के लोगों के लिए न सिर्फ कमाई का जरिया है बल्कि जीने का भी साधन है। 

यह एक जीवनशैली है जिसमें किसी बाहरी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहए। बाद में आर्थिक नीतियों पर संघ के साथ हमारी नियमित मीटिंग होने लगी। मैं कई बातों से असहमत होता था तो मैं उनके लिए खलनायक बन गया था। जब मैं अटल सरकार में वित्त मंत्री बना तो हस्तक्षेप और बढ़ गया जिससे मेरी परेशानी बढ़ने लगी और हमारे बीच फासले इतने बढ़ गए कि उसे पाटना मुमकिन नहीं रहा।


(यशवंत सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री, की पुस्तक ‘रिलेंटलेस’, प्रकाशक ब्लूम्सबरी इंडिया से साभार)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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