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Raja Shankar Shah: जानिए कौन हैं राजा शंकर शाह जिनके नाम पर रखा गया है छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम

भोपाल मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों आदिवासी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। जनजातीय वर्ग के जननायकों के नाम पर अनेक स्थानों के नामकरण किए जा रहे हैं। भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर किया गया और बिरसा मुंडा के जन्म दिन को गौरव दिवस के रूप में मनाया गया। इसके अलावा इंदौर में टंट्या भील की याद में भव्य कार्यक्रम हुआ। अब मध्य प्रदेश कैबिनेट ने छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम के नाम पर करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में राजा शंकर शाह और उनके बेटे कुंवर रघुनाथ शाह ने अपने साहस से लोगों में स्वाधीनता की अलख जगाने का काम किया था। इसके चलते उन्हें अपनी जन गंवनी पड़ी थी। अंग्रेजी हुकूमत ने दोनों को तोपों से बांधकर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए दोनों पिता-पुत्र आज भी बेहद सम्माननीय हैं। दोनों महान कवि भी थे। अपनी कविताओं के जरिए वे प्रजा में देशभक्ति का जज्बा जगाते थे। 1857 की क्रांति के समय गोंडवाना में तैनात अंग्रेजों की 52वीं रेजीमेंट का कमांडर क्लार्क बेहद क्रूर था। वह इलाके के छोटे राजाओं, जमींदारों और जनता से मनमाना कर वसूलता था। क्लार्क आम लोगों को परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। गोंडवाना राज्य के तत्कालीन राजा शंकर शाह और उनके बेटे कुंवर रघुनाथ शाह ने क्लार्क के सामने झुकने से इनकार कर दिया। दोनों ने अंग्रेज कमांडर से लोहा लेने की ठानी। दोनों ने अपने आसपास के राजाओं को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करना शुरू दिया। उनकी कविताओं ने लोगों के मन में विद्रोह की आग सुलगा दी। इन लोगों के बीच एक गद्दार और भ्रष्ट कर्मचारी गिरधारी लाल भी था, जो अंग्रेजों की मदद करता था। गिरधारी लाल राजा की कविताओं का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद कर उसका मतलब समझाता था। राजा ने उसे निष्काषित कर दिया था। क्लार्क को राजा कुंवर शाह की कोशिशों का पता चला तो उसने साधु के भेष में कुछ गुप्तचर उनके महल में भेज दिया। गुप्तचरों ने क्लार्क को बता दिया कि दो दिन बाद छावनी पर हमला होने वाला है। इसकी वजह से हमले से पहले ही 14 सितंबर को राजा शंकर शाह और उनके बेटे को क्लार्क ने बंदी बना लिया। इसके चार दिन बाद 18 सितंबर 1857 को दोनों को अलग-अलग तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया था। दोनों को अंग्रेजों ने जहां बंदी बनाकर रखा था, वर्तमान में वह जबलपुर डीएफओ कार्यालय है। हालांकि, अपनी मौत से पहले वे आम लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग भड़का चुके थे। विद्रोह की यह भावना 1947 में आजादी मिलने तक बनी रही और समय-समय पर सामने भी आती रही।


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